आलेख

पृथ्वी मात्र एक ‘ग्रह’ नहीं, हमारा ‘अस्तित्व’ है

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

आज जब हम विश्व पृथ्वी दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल कैलेंडर की एक तारीख़ नहीं, बल्कि मानवता के लिए आत्म-मंथन का एक क्षण होना चाहिए। इस वर्ष की थीम केवल नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस चरम बिंदु  की ओर इशारा कर रही है जहाँ से वापसी का मार्ग संकुचित होता जा रहा है।
विकास की अंधी दौड़ और प्रकृति का हाशिया ये विचारणीय है।
पिछली दो शताब्दियों में हमने ‘प्रगति’ की जिस परिभाषा को गढ़ा है, उसमें प्रकृति कहीं न कहीं गौण हो गई। हमने कंक्रीट के जंगलों को सभ्यता का मानक मान लिया और वास्तविक जंगलों को संसाधन की खान। आज परिणाम हमारे सामने हैं:
अनिश्चित जलवायु परिवर्तन और असमय वर्षा, भीषण लू  और पिघलते ग्लेशियर अब केवल वैज्ञानिक शोधों के विषय नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की वास्तविकता हैं।
जैव विविधता का संकट, हर साल हजारों प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, जो हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की उस कड़ी को कमज़ोर कर रही हैं जिस पर मानव जीवन टिका है।
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ ‘उपयोग करो और फेंको’ की संस्कृति चरम पर है। प्लास्टिक प्रदूषण केवल महासागरों को ही नहीं, बल्कि हमारे भोजन के माध्यम से हमारे रक्त प्रवाह तक पहुँच चुका है। विश्व पृथ्वी दिवस पर विशिष्ट चिंतन इस बात पर होना चाहिए कि क्या हम आवश्यकता’और लालच के बीच की धुंधली रेखा को पहचान पा रहे हैं?
पृथ्वी हर मनुष्य की ज़रूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है,
अक्सर हम पर्यावरण संरक्षण का उत्तरदायित्व सरकारों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों पर छोड़ देते हैं। लेकिन पृथ्वी का पुनरुद्धार एक जन-आंदोलन’ की मांग करता है। विशिष्ट बदलाव के लिए हमें तीन स्तरों पर कार्य करना होगा।
जीवनशैली में सादगी, न्यूनतम कार्बन फुटप्रिंट के साथ जीने की कला सीखना। ऊर्जा की बचत और जल संरक्षण को ‘विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘कर्तव्य’ समझना।
सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा,, कचरे को संसाधन में बदलना। रिसाइकिलिंग से बेहतर है कि हम वस्तुओं के पुन: उपयोग  और कम उपयोग  की संस्कृति विकसित करें।
स्वदेशी ज्ञान का सम्मान, हमारी पारंपरिक पद्धतियां, जो प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलने की सीख देती हैं, उन्हें आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना होग।
आने वाली पीढ़ियों के लिए ऋण
हम इस पृथ्वी के मालिक नहीं, बल्कि इसके ट्रस्टी हैं। हमें यह ग्रह हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिला, बल्कि हमने इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों से ‘उधार’ लिया है। आज का दिन संकल्प लेने का है,एक ऐसा संकल्प जहाँ विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हों।
यदि हम आज भी नहीं संभले, तो इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद रखेगा जिसने सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं किया। आइए, इस पृथ्वी दिवस पर शब्दों से आगे बढ़कर कर्म की ओर बढ़ें।

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
हरदा मध्य प्रदेश

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