साहित्य

माटी का कर्ज…हमारा फ़र्ज

सरला मेहता

हे मातृभूमि तेरी ये माटी !
साए में जिंदगी है काटी
फ़र्ज बड़ा हमें निभाना है
कर्ज उतारें मृदामाते रानी

तेरी गोदी में माँ जनम लिया
लटपट हो हमको बल मिला
वजूद हमारा आबाद हुआ
माँ तुझमें ही हम मिल जाएँ
वन उपवन बनके खिल जाएँ
कर्ज…
तेरे खेतों में हमने हल जोते
बचपन ही से बीज हम बोते
थककर आँचल में सो जाते
कच्चे-पक्के फलते दाने खाते
तेरी हरियाली को बढ़ाते जाएँ
कर्ज…
तेरी सरहदों पे सदा तैनात रहे
गैरों का तुझ पर ना निशान रहे
तेरे सुहाग की सदा ही शान रहे
ये नदियाँ तुझको सहलाती रहे
मृदा के कर्ज का फर्ज याद रहे
कर्ज…
सरला मेहता
इंदौर
स्वरचित

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