साहित्य

एक राष्ट्र, एक न्याय व्यवस्था की ओर

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य'

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ अनेक धर्म, भाषाएँ, परंपराएँ और संस्कृतियाँ सदियों से साथ-साथ विकसित होती रही हैं। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है, किंतु जब बात न्याय, अधिकार और कर्तव्यों की आती है, तब समानता का सिद्धांत सर्वोपरि हो जाता है। इसी संदर्भ में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का विषय आज राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

 

समान नागरिक संहिता का आशय है कि देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने तथा संपत्ति संबंधी कानून समान हों, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। वर्तमान में भारत में विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। संविधान के नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के अंतर्गत राज्य को यह निर्देश दिया गया है कि वह देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करे।

 

यह विषय केवल कानून का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक समानता का भी प्रश्न है।

 

धर्म रहे निज हृदय तलक, पर न्याय समान हो,

हर जन के अधिकारों का, सुंदर सम्मान हो।

भेदभाव की दीवारें अब ढह जाएँ देश में,

संविधान की आत्मा का फिर से गुणगान हो।।

 

भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। यदि अपराध के लिए दंड संहिता सबके लिए समान हो सकती है, यदि मतदान का अधिकार सबको एक जैसा प्राप्त है, तो नागरिक जीवन के अन्य महत्वपूर्ण विषयों में समानता क्यों न हो? समान नागरिक संहिता इसी प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत करती है।

 

आज भी कई बार व्यक्तिगत कानूनों के कारण महिलाओं को न्याय प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कहीं तलाक के नियम अलग हैं, कहीं उत्तराधिकार में भेद है, तो कहीं विवाह संबंधी परंपराएँ आधुनिक संवैधानिक मूल्यों से मेल नहीं खातीं। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य किसी धर्म विशेष का विरोध नहीं, बल्कि सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान संरक्षण प्रदान करना है।

 

न्याय वही सच्चा कहें, जो सबको दे मान।

भेदभाव की धूप में, सूख न पाए प्राण।।

 

हालाँकि इस विषय पर अनेक मतभेद भी हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता को प्रभावित कर सकता है। वे इसे धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं। उनका तर्क है कि भारत जैसे बहुलतावादी देश में सभी पर एक समान कानून थोपना उचित नहीं होगा।

 

किन्तु यह भी सत्य है कि समान नागरिक संहिता का अर्थ धार्मिक आस्थाओं को समाप्त करना नहीं है। यह केवल नागरिक मामलों में समानता स्थापित करने का प्रयास है। पूजा-पद्धति, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तव में यह व्यवस्था समाज में न्याय और संतुलन को मजबूत कर सकती है।

 

गोवा भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ समान नागरिक संहिता का एक स्वरूप पहले से लागू है। वहाँ सभी नागरिकों के लिए पारिवारिक कानून लगभग समान हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि विविधता के बीच भी समान नागरिक कानून संभव हैं।

 

एक धरा के लाल हैं, सबका एक विधान हो,

नारी के सम्मान का उज्ज्वल नव अभियान हो।

जाति-धर्म के नाम पर बँटता रहे न आदमी,

भारत की पहचान बस मानव का सम्मान हो।।

 

समान नागरिक संहिता केवल कानूनी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का विषय भी है। समाज में परिवर्तन सदैव संवाद, सहमति और विश्वास से आते हैं। यदि सरकार, समाज और विभिन्न धार्मिक समुदाय आपसी समझ और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ें, तो यह व्यवस्था देश की एकता को और अधिक सुदृढ़ कर सकती है।

 

यह आवश्यक है कि किसी भी कानून को लागू करने से पहले व्यापक चर्चा हो, सभी पक्षों की राय ली जाए और ऐसा प्रारूप तैयार किया जाए जो संविधान की मूल भावना तथा भारत की सांस्कृतिक आत्मा—दोनों का सम्मान करे। लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ा समाधान होता है।

 

संविधान का मंत्र है, सबको मिले अधिकार।

न्याय-दीप जलता रहे, यही राष्ट्र आधार।।

 

आज का भारत नए युग की ओर बढ़ रहा है। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय की आवश्यकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि देश का प्रत्येक नागरिक यह महसूस करे कि कानून की दृष्टि में सभी समान हैं, तो राष्ट्र के प्रति विश्वास और अधिक मजबूत होगा।

 

समान नागरिक संहिता का विषय संवेदनशील अवश्य है, लेकिन इससे विमुख होना समाधान नहीं है। आवश्यकता है संतुलित सोच, धैर्यपूर्ण संवाद और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने की। जब समाज न्याय और समानता के आधार पर आगे बढ़ता है, तभी लोकतंत्र सशक्त होता है।

 

भारत की पावन धरा, समता का संदेश दे,

हर मानव को न्याय का उजला परिवेश दे।

एक सूत्र में बँध जाएँ, सारे दिल सम्मान से,

समान नागरिक संहिता नव युग का प्रवेश दे।।

 

अंततः कहा जा सकता है कि समान नागरिक संहिता केवल कानून बनाने का विषय नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत के निर्माण का स्वप्न है जहाँ नागरिक की पहचान उसके धर्म से पहले उसके अधिकारों और कर्तव्यों से हो। यह तभी संभव होगा जब देश की विविधता का सम्मान करते हुए समानता का दीप प्रज्ज्वलित किया जाए। न्याय, समरसता और राष्ट्रीय एकता की भावना ही इस विचार की वास्तविक आत्मा है।

 

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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