
सिसकती सिहरती धरा, सिमटती सकुचाती धरा I
जाने कौन इसके अस्तित्व से खिलवाड़ कर रहा ?
विकास के नाम सभी कर रहें विनाश प्रकृति का I
काट वन बसा रहे शहर ,
गगन से नमन करते ,कंक्रीट से बनी इमारतों का I
साथ ही विगुल बजा रहे, औद्योयोगिक क्रांति का I
पर भूल रहे सभी,जलवायु में हो रहा तीव्र परिवर्त्तन। हिमखण्ड है पिघल रहा ।
साथ ही सागर का , जल स्तर भी तीव्रता से बढ़ रहा ।
कहीं अचानक बादल फटना,
कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा पड़ना,
प्रदुषण भी ओजोन परत में सुराख बढ़ाता जा रहा ।
मानव अपने ही रचायें विकास के
भंवर में उलझ रहा ।
अब तो जाग जा मानव करके संकल्प ।
“अब ना पेड़ कटने देगें,कोई वन ना उजड़ने देगें ”
जल का भी करेंगें संरक्षण,
सभी मिल करें धरती की हरियाली का नवसृजन ।
निवेदिता सिन्हा
गया जी( बिहार)
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