धरा का मिल कर करें श्रृंगार।
वृक्ष लगाकर हजार और हजार।।
वही हरियाली प्रकृति को लौटा दें।
जैसे सौंपी थी ईश्वर ने हमें।।
पेड़- पौधे धरती के आभूषण।
सजती धरा मानो लगे दुल्हन।।
बदले में हवा का दें विस्तार।
संग में शीतल छाया पाएँ भरपूर।।
चलो संकल्प आज सब ले लें।
कभी न वृक्षों को काटेंगे।।
माना विकास जरूरी आज।
पर न हो वसुधा का उपहास।।
झरनों, नदियों की वही आहट होगी।
पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देगी।।
भूजल संरक्षित फिर होगा।
कोई प्यास धरा पे न होगा।।
नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड




