
आओ चलें –बचायें प्रकृति को
उजड़ने और नष्ट होने से
लेकर छोटा पौधा एक दिन
चलों लगायें धरती पर
देकर उसमें , खाद और पानी
मजबूत बनायें –धीरे धीरे
जब वह पौधा बन जायेगा
वृक्ष एक दिन होकर -बड़ा
जो देगा लोगों को
शीतल छाया और मीठे फल
और साथ में देगा-जीवन दायी
स्वच्छ और निर्मल वायु को
आओ चलें –लगायें इक पेड़
और बचायें –प्रकृति को ….
जब ढेरों होंगे –वृक्ष घनेरे
तब ,होगी वर्षा समय समय पर
और खत्म होगा सूखा पानी का
धीरे धीरे इस वसुधा से
आओ चलें –लगायें इक पेड़
और बचायें इस वसुधा को
बंजर होने और उजड़ने से ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब
स्वरचित मौलिक रचना
21-04-2026




