
तप्त हुआ दिनकर अतिशय अब,
जीव-जन्तु लाचार।
बरस रहे नभ से अंगारे,
चहुँदिश हाहाकार।।
ज्येष्ठ मास की तप्त दुपहरी,
प्रात: हो या शाम।
जनता झुलस रही है नित दिन,
कहीं नहीं आराम।।
तापमान के तीव्र तपन से,
व्याकुल है संसार।
बरस रहे नभ से अंगारे,
चहुँदिश हाहाकार।।
उषाकाल में कलरव करते,
पंछी हुए उदास।
जल बिन व्याकुल हैं सब जलचर,
मिटे नहीं अब त्रास।।
राहत हो इस उष्मा से जब,
तरु हो छायादार।
बरस रहे नभ से अंगारे,
चहुँदिश हाहाकार।।
ताल-तलैया शुष्क हुए सब,
जंगल है वीरान।
रौद्र रूप है तापमान का,
जीव-जंतु हलकान।।
मरुधर बना हुआ है आँगन,
शुष्क हुए घरबार।
बरस रहे नभ से अंगारे,
चहुँदिश हाहाकार।।
© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




