
नीली चादर में छुपा के छार,
सहे सैकड़ों बोझों का भार,
सहती है चोटें नित बेसुमार,
फरियादी बेबस व लाचार।
कभी हरीतिमा उसकी शान,
होके आज बंजर सूखी जान।
सुनातीं थीं नदियाँ गीत कभी,
अब हुए,मौन कहकहे सभी।
आंधी, बारिश, तूफान कहर,
चुप्पी जंगल की,काटे प्रहर।
अंधे शहर के शोर में खो गई,
चीखें धरा की,अनकही रह गईं।
फिर भी उठे है उसकी पुकार,
हवा के झोंके संग ए मेरे यार।
कि इंसान सुन ले उसकी बात,
थोड़ा ठहर,कर तो मुलाकात।
अनकही फरियाद है धरा की,
“मुझे बचा,फिर से संवार लो,
मेरे वजूद से पहचान जान लो
ये बात बेटा अच्छे से मान लो
जंगल के दिल में बजती थी,
पत्तों की खड़कन हंसती थी,
जहाँ पशु-पक्षी थे हँसते-गाते,
मानो त्यौहार है कोई मनाते।
मगर अब सन्नाटा है पसरा ,
कुल्हाड़ियों से फैला खसरा,
हर तरफ बस टूटती डालियां,
करतीं क्रन्दन शहरी गलियां।
बेजुबानों की आँखों में है डर,
कहाँ जाएं छिपें, कहां है घर
हर एक चीत्कार है अब मौन,
कैसी हुई स्वार्थी मानव कौम।
पक्षियों के घोंसले गिरते देखे,
उड़ान में हैं छिपे दर्द की रेखें,
आकाश को देखते हैं बेबस,
पूछ रहे,”कहाँ जाएं हम सब?”
छार–राख
डॉ विजय लक्ष्मी
‘अनाम अपराजिता’
मुख्य केंद्रीय सचिव
रायबरेली काव्य रस साहित्य मंच समूह ( भारत )
अहमदाबाद




