
हे धरती माँ ! तुम्हारा कर्ज उतारें कैसे?
हे आदि माँ!तुम्हीं ने माँ का सृजन दान दिया है,
अज़ब प्यारा सा यह संसार बसाया तुमने,
तुम्हारी शक्ति ने ही पितृ का स्थान लिया है।
तुम्हीं वह खान हो जिसने हमें धन-धान्य दिया है,
तुम्हीं वह ज्ञान हो जिसने हमें धीमान् किया है,
तुम्हारी मित्रता को सूर्य ने स्वीकार किया है,
रजतमय चाँदनी को चाँद ने भी वार दिया है।
तुम्हीं में दिव्य ऊर्जा का भरा भंडार आया है,
तुम्हीं ने वायु का जल का गज़ब संचार पाया है,
तुम्हीं पर झूलते आकाश ने ङमोती बिछाए हैं,
तुम्हें तो अग्नि ने निज तेज का वरदान दिया है।
परम सौभाग्य है अपना तुम्हारी गोद में आए,
अरे! किस्मत भली कितनी कि मानव रूप भी पाए,
तुम्हारी छाँव में हम जिंदगी के साज बुन डाले,
अहो! तू वत्सला कितनी? प्रकृति का दान दिया है।
तुम्हारी गोद में शिशुगण उछलते खिल-खिलाते हैं,
तुम्हारे बाग के पक्षी फुदकते चह- चहाते हैं,
तुम्हारा शिल्प चींटी में तुम्हारी शक्ति हाथी में,
मनुज को कला का,विज्ञान का सब साज दिया है।
कभी जब सोचता है मन तुम्हारी दिव्य महिमा को,
कभी जब देखती आँखें खिले फूलों की रचना को,
तो मन की भाव विह्वलता बहुत रोके नहीं रुकती,
भला हम धन्य हैं कितने? यहाँ जो जन्म लिया है।
हे माता! गर्व करना तुम यहाँ लायक सपूतों पर,
कभी तो रो भी जाती हो तू निजघाती कपूतों पर,
अगर कुछ ज्ञान संचित हो तो उनको बाँट ही देना,
जिन्होंने माँ की थाती को अहं में बाँध लिया है।
राम शंकर सिंह




