
कागज़ की महक में बसा है जहान,
सियाही से लिखी हर एक दास्तान।
पुस्तकें नहीं, ये खिड़कियाँ हैं,
जिनसे दिखता नया आसमान।
एक किताब हाथ में आ जाए,
तो अकेलापन भी दोस्त बन जाए।
प्रेमचंद का गाँव, शेक्सपियर का मंच,
टैगोर का गीत – सब पास आ जाए।
पर हर पन्ने के पीछे है मेहनत,
एक लेखक के रातों की इबादत।
सोच, कलम, आँसू, नींदें बेचकर,
उसने रचा है शब्दों का भारत।
कॉपीराइट उसका हक़ है प्यारे,
चोरी न हो उसकी हुनर की बहारे।
जैसे खेत का दाना किसान का,
वैसे ही रचना – रचनाकार का।
नक़ल से मत बुझाओ दीपक उसका,
खरीदो किताब, दो मान हुनर का।
PDF फ्री में बाँटने से पहले सोचना,
किसी के चूल्हे का सवाल है ये भी।
विश्व पुस्तक दिवस बस याद दिलाए,
पढ़ना है तो हक़ से पढ़ना सिखाए।
लाइब्रेरी जाओ, बुक स्टॉल जाओ,
एक किताब से दोस्ती कर आओ।
क्योंकि जो कौम किताबें बचाती है,
वही तारीख़ खुद लिख जाती है।
तो आज प्रण लो – पढ़ेंगे, पढ़ाएँगे,
और कलम का सम्मान बढ़ाएँगे।
*किताब ज़िंदा रहेगी, तो ख्वाब ज़िंदा रहेंगे।*
डॉ संजीदा खानम शाहीन




