
हाड़ तोड़ मेहनत सब करते।
दाम नहीं उनके जब मिलते।।
बच्चें भूखे सो जाते है।
दुखड़ा कभी न कह पाते हैं।।
कहलाते मजदूर यही है।
सूखी रोटी भाग्य नहीं है।।
सिर पर खप्पर खाट नहीं है।
कोई उनपर हाथ नहीं है।।
वर्ष बहुत ही बीत गयी है।
राते कितनी रीति गयी है।।
कलप रहे हैं आज सभी हैं।
भूख नही अब मिटे कभी हैं।।
सभी मनाते मजदूर दिवस।
छंद गीत कवि गण लिखें हरिस।।
भाव पिरोते अपने मन के।
लिए नहीं सुधि उनके तन के।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️




