साहित्य

श्रमिक दिवस

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

मुट्ठी में सूरज लेकर चलता,
पांवों में छाले भी खिलते हैं,
वो श्रमिक है—जो पत्थरों में
अपने सपनों के घर मिलते हैं।
न कोई ताज, न कोई शोहरत,
न ही मंचों की तालियाँ,
उसके हिस्से आती हैं बस
मेहनत की सच्ची गलियाँ।
ईंटों से जो महल बनाता,
खुद छांव को तरस जाता है,
दूसरों की खुशियों के खातिर
अपना हर दिन गँवाता है।
भूख से लड़ता, धूप से भिड़ता,
पसीने से इतिहास लिखे,
धरती माँ की कोख से उठकर
आसमान को छूने निकले।
उसके हाथों की लकीरों में
देश की तकदीर बसती है,
उसकी हर एक बूंद पसीने में
भारत की तस्वीर बसती है।
चलो आज हम प्रण ये लें—
न उसका मान कभी घटे,
हर श्रमिक को सम्मान मिले,
उसका जीवन भी फूलों सा खिले।
क्योंकि वही है असली नायक,
जिससे दुनिया चलती है,
श्रमिक के बिना ये धरती भी
सिर्फ एक खामोश मूरत लगती है।

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़

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