
मजदूर प्रचंड गर्मी में ठिठूरती सर्दी में तेज बरसात में खुले आसमान के नीचे करता है मजदूरी।
कठिन परिश्रम भूल कर मन में रखता है विश्वास भूखा प्यासा रहकर निरंतर करता रहता है काम।
मजदूर अपना घर न बनाकर दूसरों का आलीशान घर बनाकर उनकी खुशियों में लगाता है चार चांद।
दिन रात मेहनत करके खून पसीना बहाकर पालता है अपना परिवार।
कहलाते हैं मजदूर यही सूखी रोटी, प्याज गुड खाकर अपना जीवन व्यापन करते हैं।
सुरेन्द्र कुमार बिन्दल “कलमकार “जयपुर।
स्वरचित मौलिक रचना।




