
का कही हम गरीब मजदूर बानी ,
काम करे खातिर घर से दूर बानी।
हमरो कोई आपन बाटे ई दुनिया में,
ए ही से जिय खातिर मजबूर बानी।।
घर,महल, मंदिर ,मॉल बनाई ला ,
दिन रात मेहनत करके कमाई ला।
मड़ई में रात गुजारे ला मजबूर बानी ,
का कही हम एक मजदूर बानी।।
धान,गेहूं,चना मकई उपजाई ला,
रात के बनल रोटी दू जून खाई ला।
पापी पेट के खातिर मजबूर बानी ,
का कही हम गरीब मजदूर बानी।।
पढ़े लिखे के हाथ में लकीर ना रहल,
अंखियन में स्वप्न के तस्वीर ना रहल।
ईट ,पत्थर से खेले ला मजबूर बानी ,
का कही हम गरीब मजदूर बानी।।
खोद सोना रजत हीरा निकाली ला,
गरल अमृत के खूब पहीचानिला।
पर सोना चांनी छुए से दूर बानी,
का कही हम एक मजदूर बानी।।
गाड़ी,फर्नीचर,सब हमी बनाई ला,
धागा,तांता से रेशमी वस्त्र बनाई ला।
बाकीर फटही पहने ला मजबूर बानी,
का कही हम एक मजदूर बानी।।
मुन्ना प्रसाद
शिक्षक सह कवि
रोहतास बिहार




