साहित्य

में तो मजदूर हूं मजदूरी करूंगा

कुलदीप सिंह रुहेला

मैं तो मजदूर हूँ, मजदूरी करूँगा,
मेहनत की रोटी से पेट भरूँगा।
फटे हुए कपड़ों में सपने सजाए,
आँखों में फिर भी उजाले भरूँगा।

मैं तो मजदूर हूँ, मजदूरी करूँगा,
दर्द छुपाकर भी हँसता रहूँगा।
घर पे जो बच्चे मेरी राह तकें
उनके लिए हर दिन जीता रहूँगा।

धूप जलाती है, बदन भी जलता,
पैरों में छाले दिल भी थकता।
फिर भी सुबह जब सूरज निकलता
उम्मीद का दीपक मन में जलता।

मैं तो मजदूर हूँ, मजदूरी करूँगा,
आंसू पीकर भी काम करूँगा।
कभी जो रोटी कम पड़ जाती
भूखा रहकर भी सब सह लूँगा।

बीवी की आँखों में चिंता दिखती,
बच्चों की ख्वाहिश दिल को चुभती।
फिर भी मैं हिम्मत नहीं हारता,
टूटी सांसों से किस्मत लिखती।

मैं तो मजदूर हूँ, मजदूरी करूँगा,
टूटे दिल से भी आगे बढ़ूँगा।
मेहनत ही मेरी पूजा है यारों
इसी सहारे जीवन काटूँगा।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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