साहित्य

ग़ज़ल

वाई.वेद प्रकाश

क्या खोना क्या पाना है यह मजदूरी का दाना है ।
पेट भरो फिर काम चलो इतना ताना- बना है
सुबह शाम की रोटी को हर पल खटना पड़ता है,
सदियों से चलता आया यह अपना राग पुराना है ।
खून पसीने के बल पर हम रचते हैं संसार बड़ा,
पग- पग पर संघर्ष झेलना जीवन का पैमाना है ।
गढ़ते हैं तकदीर देश की रखते हैं तस्वीर बड़ी ,
दीन -दलित बस्ती में आखिर किसका आना जाना है ।
महल बनाते जग की खातिर खुद रहते झोपड़ियों में,
धूल- धुएं- मिट्टी संग रहकर जीवन उन्हें बिताना है।

वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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