
जलते सूरज की चिंगारी
अब केवल मौसम में नहीं है,
मनुष्य के भीतर फैली
अतृप्त इच्छाओं की गर्मी है।
धरती का यह सूखा आँचल
केवल वर्षा की कमी नहीं है,
जो कभी वृक्षों की छाँव बनती थी
यह उस करुणा का अभाव है।
नदियाँ इसलिए नहीं रूठीं
कि बादल कम बरसे हैं,
वे इसलिए मौन हुई हैं
मनुष्य की प्यास समुद्र समान बन गई है।
हर कटते वृक्ष के साथ
एक प्रार्थना गिरती है,
हर सूखे पोखर ,झरने में
सभ्यता का चेहरा दिखाई देता है।
जीव-जंतु तो व्याकुल हैं
पर उनसे बेचैन मनुष्य की आत्मा है,
जो ऊँची इमारतों में रहकर भी
ठंडी छाँव खोजती फिरती है।
यह ताप केवल धूप का नहीं,
मनुष्य के अहंकार का भी है
जो धरती को वस्तु समझता है
और प्रकृति को अनश्वर बाज़ार।
यदि सच में शीतलता चाहिए
तो हृदय को भी बदलना होगा,
वृक्ष लगा सिर्फ पर्यावरण बचाना नहीं
अपने भीतर की मानवता को सींचना होगा।
जब छत पर रखा जल
पक्षियों की प्यास बुझाता है,
तब वह मनुष्य के भीतर
दया का दीप भी जलाता है।
प्रकृति बार-बार चेतावनी देती है
वो हमारी संपत्ति नहीं है,
उसका क्षरण बंद करो,क्योंकि
वो हमारा ही विस्तारित स्वरूप है।
जब यह बात मनुष्य समझ जाएगा,
उस दिन नभ से आग नहीं बरसेगी,
और हरियाली धरती फिर से
माँ के आँचल सी छाँव देगी।
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




