साहित्य

हकीकत

डॉ.उदयराज मिश्र

बारिश में जो घर चुवे, भोर भये तकरार।

जाया कर्कश बोल से,करे अतिथि सत्कार।।

करे अतिथि सत्कार, पुत्र स्वच्छंदी होवें।

भये निशाचर जान, दिवसभर सारे सोवें।।

कहत ‘उदय’करि सोच,नीक इनसे लावारिश।

बाप जियत मरि जाय, मास बारह हो बारिश।।

 

बेंचि बाँचि घर गांव का,जाय बसे परदेश।

बड़ी बतकहीं नित करें,करैं बहुत उपदेश।।

करैं बहुत उपदेश,सबहिं कहुँ जुगुति बतावैं।

फूँकेन आपन गेह,अउर घर आगि लगावैं।।

कहत’उदय’धरि नेह,मनहुँ मन्ह कोसों सोचि।

अंत बहुत पछतायं ,मूढ़ आपन गृह बेंचि।।

 

छननी में सब छन गए,पुरजन परिजन मीत।

महमारी शिक्षक बनी,कहे जगत की रीत।।

कहे जगत की रीत,भले घरबार भरा था।

छोड़ गए सब दूर,हाय, सम्बन्ध मरा था।।

कहत’उदय’भरि नीर,आह भरि बिलपत जननी।

और न दूजा कोउ,कहै बनि शिक्षक छननी।।

 

-डॉ.उदयराज मिश्र

 

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