
दर्द बिरह का होता गहरा।
कामदेव का लगता पहरा।।
सावन मास सलोने बादल।
चमक रही नभ चपला चंचल।।
रिमझिम- रिमझिम पड़ी फुहारें।
प्रकृति रूप को सहज सँवारें।।
धरती पहनी चूनर धानी।
बरस रहा है झम-झम पानी।।
मोर नाचते हैं उपवन में।
प्रिया सिसकती है आंँगन में।।
प्रिय की अपलक राह निहारे ।
कब आएंँगे प्रीतम प्यारे।।
कोयल कूक रही तरुवर पर।
तेरी याद सताती प्रियवर।।
दर्द मरुस्थल सा है छाए।
आह मौन कंठो तक आए।।
नहीं किसी को इसे सुनाती।
आंँसू भी सारे पी जाती।।
तेरी यादों में खोई हूंँ।
नहीं निशा भर मैं सोई हूंँ।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




