साहित्य

पत्रकारिता दिवस पर

डो. दक्षा जोशी

क़लम पकड़कर सच लिखना बेहद ज़रूरी।

बिकता जब ईमान, तड़पती है मज़बूरी।

लोकतंत्र का स्तंभ आज क्यों डगमगाता?

टीआरपी की दौड़ में सत्य खो जाता।

चीखते हैं लोग, शोर जीत जाता।

मौन सिसकियों को कौन है सुनता?

विज्ञापनों के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई।

चाटुकारिता ने हर तरफ़ धूल उड़ाई।

भूल गए अधिकार, चापलूसी धर्म माना।

दर्द से तड़पती जनता को न जाना।

निष्पक्षता की क़सम आज याद दिलाओ।

सोए हुए ज़मीर को फ़िर जगाओ।

सत्ता के गलियारों में प्रश्न उठाना।

शोषितों की आवाज़ को आगे बढ़ाना।

बिकाऊ नहीं विचार,

यह ज़रा समझो।

क़लम की इस ताक़त को तुम परखो।

अँधेरे को चीरकर रोशनी तुम लाओ।

पत्रकारिता का खोया मान फ़िर पाओ।

सच के रास्ते पर डटे रहना हमेशा।

मत बदलो तुम कभी अपना उद्देश्य।

-डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

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