साहित्य

आंतरिक संप्रभुता का अमोघ अस्त्र, विकारों के कोलाहल में शांत रहने की कला

​डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

आज का मानव विकास और तकनीक के शिख़र पर बैठकर भी भीतर से अत्यंत अशांत और बेचैन है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ बाहरी सुख-सुविधाओं के साधन तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, लेकिन आंतरिक संतोष और मानसिक स्थिरता लगातार घटती जा रही है। समकालीन सामाजिक परिवेश में हर ओर उत्तेजना और त्वरित प्रतिक्रिया का बोलबाला है। इस कोलाहलपूर्ण वातावरण में शांत रहने की कला को खो देना हमारी सबसे बड़ी विफ़लता है। हर परिस्थिति में शांत रहना आपका सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र है, लोगों में इतनी ताक़त नहीं होनी चाहिए कि वे आपसे प्रतिक्रिया निकलवा लें,जब तक कि आप स्वयं न चाहें। यह विचार केवल एक सुविचार नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन को गरिमा और सार्थकता के साथ जीने का एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है। भारतीय वास्तुकला, दर्शन और पौराणिक आख़्यानों में ब्रह्मास्त्र को एक ऐसे अमोघ अस्त्र के रूप में परिभाषित किया गया है जिसका कोई प्रतिकार नहीं होता और जो अंततः विजय निश्चित करता है। समकालीन संदर्भों में जब हम शांति को ब्रह्मास्त्र कहते हैं, तो इसका तात्पर्य किसी कायरता, मूक सहमति या असहाय आत्मसमर्पण से क़तई नहीं है; इसके विपरीत, अशांत और उत्तेजक परिस्थितियों के बीच स्वयं को स्थिर रख पाना अत्यंत उच्च श्रेणी के आत्म-बल और मानसिक दृढ़ता का परिचायक है। क्रोध, आक्रोश और चीख़-पुकार मचाना बेहद आसान है क्योंकि इसके लिए किसी आत्म-नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होती, यह तो केवल एक आदिम या पशुवत प्रवृत्ति है। परंतु सामने से आ रही नकारात्मक ऊर्जा, अपमान या उकसावे को अपनी शांति की ढाल पर सोख लेना और अडिग बने रहना, सच्चे अर्थों में एक आध्यात्मिक और मानसिक ब्रह्मास्त्र का संधान करना है। इस दार्शनिक विचार का सबसे व्यावहारिक और मर्मस्पर्शी हिस्सा हमें हमारे व्यवहार के आत्म-विश्लेषण के लिए प्रेरित करता है। मनोविज्ञान के अनुसार, मानव व्यवहार को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। ‘प्रतिक्रिया’और ‘अनुक्रिया’ । प्रतिक्रिया पूरी तरह से अचेतन, तात्कालिक और भावनाओं के आवेग में बहकर की जाने वाली क्रिया है, जैसे यदि किसी व्यक्ति ने आपके प्रति कटु शब्दों का प्रयोग किया और आपने तुरंत उसी लहजे में पलटकर जवाब दे दिया, तो इस स्थिति में आप स्वतः ही अपनी चेतना और विवेक को खो बैठते हैं। इसके विपरीत, अनुक्रिया एक सचेत, विचारशील और विवेकपूर्ण प्रक्रिया है, जहाँ विपरीत परिस्थितियों के सामने आप कुछ क्षणों का ठहराव लेते हैं, स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन करते हैं और फ़िर तय करते हैं कि यहाँ चुप रहना श्रेयस्कर है अथवा अत्यंत मर्यादित शब्दों में अपनी बात रखना। यह पंक्ति सीधे तौर पर हमारी मानसिक संप्रभुता पर प्रहार करती है कि यदि समाज का कोई भी व्यक्ति आपको ज़रा सी बात पर क्रोधित, उद्वेलित या दुखी कर सकता है, तो आपको यह स्वीकार करना होगा कि आप उस व्यक्ति के भावनात्मक ग़ुलाम हैं। आपने अपने मन की शांति और अपनी ऊर्जा का नियंत्रण उस बाहरी व्यक्ति के हाथों में सौंप दिया है। वास्तविक स्वतंत्रता और आत्म-स्वामित्व इसी में है कि आपकी आंतरिक व्यवस्था पर केवल और केवल आपका अधिकार हो। एक चिकित्सक और प्रबुद्ध विचारक के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इस सिद्धांत को जीवन में उतारने के बहुआयामी लाभ हैं, यह हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा कर उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और अवसाद जैसी बीमारियों के विरुद्ध एक प्राकृतिक चिकित्सा की तरह काम करता है, व्यर्थ के वाक-युद्धों से हमारी सीमित ऊर्जा का रचनात्मक संरक्षण करता है, तथा व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक जीवन के संबंधों में आवेश के क्षणों में उत्पन्न होने वाले बिखराव को रोककर उनमें माधुर्य और प्रगाढ़ता लाता है। अंततःहर परिस्थिति में शांत रहने की यह क्षमता कोई ऐसी कला नहीं है जो रातों-रात सीखी जा सके; इसके लिए निरंतर आत्म-अवलोकन, सजगता और धैर्यपूर्ण अभ्यास की आवश्यकता होती है। जब हम धीरे-धीरे अपने भीतर इस चेतना को जाग्रत कर लेते हैं, तो बाहरी दुनिया का शोर हमारे भीतर के सन्नाटे को भंग नहीं कर पाता। जैसा कि संत-महात्माओं और दार्शनिकों ने सदैव प्रतिपादित किया है कि जिसने मन को जीत लिया उसने मानो संपूर्ण जगत को जीत लिया। आइए, हम सब मिलकर इस महती विचार को केवल दीवारों पर टांगने या संदेशों में भेजने तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने आचार-विचार और व्यवहार का अभिन्न हिस्सा बनाएं,अपनी भावनाओं के स्वामी स्वयं बनिए, क्योंकि इसी आत्म-विजेता भाव में ही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता, गरिमा और मुक्ति निहित है।

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