
नदी का पानी काला हुआ जाए,
हवा में ज़हर रोज़ घुला जावीए।
पेड़ कटें और कंक्रीट उग आए,
तो धरती माँ का कलेजा दुख जाए।
प्लास्टिक उड़े और साँसों में अटके,
पंछी भी दाना ढूँढते भटके।
ग्लेशियर पिघले, समंदर चढ़ आए,
गाँव के गाँव पानी में डूब जाए।
गर्मी बढ़े तो फसलें जल जाएँ,
बारिश रुके तो भूख से बिलखाएँ।
ये असमय का कहर कोई और नहीं,
हमारी ही करनी का फल है कहीं।
अब भी वक्त है, चेत जाओ दोस्तो,
पेड़ लगाओ, नदी-नाले सँवारो।
पॉलिथीन छोड़ो, साइकिल अपनाओ,
धरती को फिर से दुल्हन बनाओ।
पर्यावरण का प्रदूषण जो रोकेंगे,
तभी असमय का कहर भी रॉकेंगे।
आओ मिलकर कसम ये खाएँ,
हरी-भरी धरती आने वाली नस्लों को दें जाएँ।
मौलिक, स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन


