
वह अब नहीं रही…ब एक स्त्री इस संसार से विदा होती है,
तो केवल एक देह नहीं जाती,
समय की एक धड़कन थम जाती है,
घर की आत्मा कहीं दूर निकल जाती है।
दीवारें तब भी खड़ी रहती हैं,
पर उनमें गूँजती उसकी आवाज़ खो जाती है,
आँगन वैसा ही रहता है,
पर उसकी प्रतीक्षा में धूप भी फीकी पड़ जाती है।
चूल्हा जलता है, बर्तन खनकते हैं,
पर स्वाद में वह ममता नहीं रहती,
रोटियाँ तो बनती हैं रोज़,
पर उनमें उसके स्पर्श की गरमाहट नहीं रहती।
उसकी साड़ियाँ अलमारी में टंगी रहती हैं,
जैसे स्मृतियों ने वस्त्र पहन लिए हों,
चूड़ियाँ चुपचाप पड़ी रहती हैं,
मानो समय अपने गीत भूल गए हों।
नदियाँ बहती हैं, पंछी गाते हैं,
ऋतुएँ आती-जाती रहती हैं,
पर जिन आँखों ने उसे चाहा था,
उनके भीतर एक मौसम ठहर जाता है।
तब समझ में आता है,
मनुष्य केवल शरीर नहीं होता,
वह अपने स्पर्श से वस्तुओं में,
अपने प्रेम से संबंधों में,
और अपनी कर्मों से संसार में बस जाता है।
मृत्यु उसे ले जाती है,
पर उसका होना समाप्त नहीं होता,
वह रसोई की खुशबू में,पुराने गीतों में,
और घर के हर कोने में जीवित रहती है।
यही जीवन का सत्य है,
जो प्रेम करता है, वह कभी पूरी तरह नहीं मरता,
उसकी अनुपस्थिति ही उसकी उपस्थिति का
सबसे गहरा प्रमाण बन जाती है।
एक मौन सा पसरा रहता है
और तब सारा घर महसूस सुमन बिष्ट, नोएडाकरता है,
वह अब नहीं रही,फिर भी,
वह घर के हर कोने में बसी है॥
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा



