साहित्य

बातों से मारो गोली  

डॉ संजीदा खानम शाहीन

हथियार उठाने से पहले, ज़रा बातों से मारो गोली,

लफ्ज़ों में भी ताकत है, दिल को छलनी कर दे बोली।

गुस्से की तलवार से बेहतर, नरमी की ढाल होती,

एक मीठी बात से सुलझे, लाखों की लड़ाई होती।

 

ताने के तीर चलाकर, रिश्तों को ना घायल करो,

शब्दों के बम फोड़ के, अपनों को ना बदहाल करो।

जुबान की गोली ऐसी, जख्म जो न दिखते,

पर सालों साल चुभते, और रिसते ही रहते।

 

इसलिए सोच के बोलो, तोल के बोलो भाई,

कड़वी बात में भी थोड़ी, शक्कर घोलो भाई।

बातों से ही बनते बिगड़ते, सारे रिश्ते-नाते,

बातों से ही मिल जाते, बिछड़े हुए साथी।

 

गोली बंदूक की मारे, बस एक ही बार,

पर बातों की गोली मारे, हर दिन सौ-सौ बार।

तो चलो आज से कसम खाएँ, मीठी वाणी बोलेंगे,

बातों से ना मारेंगे गोली, दिलों को जोड़ेंगे।

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