
प्रतिसंवेदनशील चुनौतियां और लक्ष्य प्राप्ति
चुनौती शब्द स्वयं में किसी द्वंद का परिचायक है।मानव जीवन भी इन्हीं चुनौतियों का प्रतिफल होता है।जो लोग लक्ष्य प्राप्ति हेतु सम्मुख उत्पन्न चुनौतियों का सामना करते हैं,वे विजयी होने पर लक्ष्य प्राप्त करते हैं और यदि संघर्षों की बेदी पर बलि देते हैं तो अमरत्व को प्राप्त करते हैं।दूसरी तरफ जो चुनौतियों से भागते हैं,वे अपने जीवन लक्ष्यों से कोसों दूर रहते हैं।इन्हें ही असफल कहा जाता है।इस प्रकार सफलता स्वयं में चुनौतियों की प्रतिफल होती है।
मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है-
देखकर बाधा विविध,बहु विघ्न घबड़ाते नहीं।
रह भरोसे भाग्य के,दुख भोग पछताते नहीं।।
गुप्त जी के अनुसार जीवन में सफलता प्राप्त व्यक्तियों का जीवन दर्शन सदैव कसौटियों से होकर निखार को प्राप्त हुआ होता है।जो कभी भी विघ्नों या बाधाओं को देखकर न तो पीछे हटते हैं और न ही घबड़ाते हैं।वे सदैव चुनौतियों से प्रतिसम्वेदनशील होकर समस्याओं का समाधान ढूंढने में आनंदित होते हैं।यही कारण है कि जिसप्रकार सोने का खरापन अग्नि में तपाने से आता है उसीप्रकार चुनौतियों का सामना करना ही आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण का सर्वश्रेष्ठ उपागम है।
चुनौतियों और व्यक्तित्व विकास में इनके योगदान के बाबत बर्नार्ड शा अक्सर कहा करते थे कि लोग मरते तो हैं बहुत पहले किन्तु दफनाए बहुत बाद में जाते हैं।मरने और दफनाने में कोई चालीस वर्ष का फर्क हो जाता है।बर्नार्ड शा कहते थे कि कोई व्यक्ति जिस क्षण जीवन की चुनौती को स्वीकार करना बंद कर देता है,उसी क्षण मर जाता है।इसप्रकार जीवन को प्रतिपल चुनौतियों की स्वीकृति के रूप से भी परिभाषित किया जा सकता है।जिसका कि भारतीय वाङ्गमय भी पुरजोर समर्थन करते हुए कहते हैं कि-
त्याज्यं न धैर्यम विधुरेपि काले।
अर्थात संकट के समय धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए।धैर्य ही चुनौती से निपटने हेतु उत्साह सम्पन्न होने का प्रथम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपागम है।किसी कवि ने भी जीवन और चुनौतियों को परिभाषित करते हुए लिखा है-
चल चल रे राही चल,चलना है जिंदगी।
गिरना नहीं है,गिर के,सम्भलना है जिंदगी।।
विद्वानों के अनुसार जीवन चुनौतियों का खेल है।ये चुनौतियां ही हैं जो व्यक्ति के उत्थान और पतन की निर्धारक होती हैं।दायित्व निर्धारण भी चुनौतियों की ही देन है।प्रायः चुनौतियां दो प्रकार की होती हैं,एक वह जो क्रोध व आवेश के कारण होती है,जिसे क्रोधजन्य चुनौती कहते हैं।यह सङ्घर्ष,विवाद और पतन का हेतु भी बनती है।जबकि यदि मुश्किलों के उत्तपन्न होने पर सदेच्छापूर्वक उनका समाधान करने का दृढ़ निश्चय किया जाता है तो ऐसी चुनौतियां प्रतिसम्वेदनशील चुनौतियां कहलाती हैं।मानव के जीवन में चरमोत्कर्ष और उत्थान हेतु यही प्रतिसम्वेदनशील चुनौतियां ही सकारात्मक होती हैं।
अगर क्रोधजन्य व प्रतिसम्वेदनशील चुनौतियों का समग्र अनुशीलन किया जाय तो महाभारत का युद्ध इनका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।कुरुक्षेत्र में जब कौरवों व पांडवों की सेनाएं परस्पर आमने-सामने खड़ी हुईं तो युद्ध आरंभ होने के पूर्व सर्वप्रथम शंखनाद कौरवों के सेनापति भीष्म पितामह द्वारा किया गया।जिसका प्रत्युत्तर पांडवों की बजाय सारथि रूप में युद्ध से विरत श्रीकृष्ण ने अपना शंख बजाकर दिया था।जिससे यह प्रश्न उभरता है कि आखिर जब श्रीकृष्ण युद्ध से विरत औरकि केवल सारथि बने थे तो फिर भीष्म के शंखनाद करने पर पांडवों की बजाय स्वयम प्रत्युत्तर क्यों दिया?भीष्म का प्रत्युत्तर पांडवों ने क्यों नहीं शंख बजाकर दिया?
वस्तुतः पांडव कभी भी युद्ध के लिए तैयार नहीं थे,वे समझौते में केवल पांच गांव भी पा जाते तो युद्ध टल सकता था।पांडवों के लिए युद्ध अंतिम विकल्प था।यही कारण है कि पांडव युद्ध प्रारम्भ करने का आरोप और दोषारोपण स्वयम पर नहीं लेना चाहते थे।अतः पांडवों ने भीष्म के शंख बजाकर चुनौती देने पर भी उसे चुनौती नहीं माना और कि सबकुछ परमेश्वर अर्थात श्रीकृष्ण पर छोड़ दिया।श्रीकृष्ण जो भी करेंगें,अच्छा करेंगें,यही सोच पांडवों की श्रीकृष्ण के परतीं अटूट श्रद्धा थी।लिहाजा श्रद्धा कभी भी चुनौती नहीं बल्कि समर्पण को समर्पित होती है।अतः पांडवों का शंखनाद न करना सर्वथा उचित था क्योंकि अपनों से लड़ने की चुनौती स्वीकार करना महाविनाश को आमंत्रण देती है।भीष्म द्वारा शंखनाद करने पर सारथी रूपी श्रीकृष्ण का शंख बजाना यद्यपि क्रोधजन्य नहीं है तथापि यह ये संसूचित करता है कि यदि इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त गंगापुत्र भीष्म भी अन्याय का प्रतिकार करने की बजाय अन्याय के समर्थन में सत्य के विरुद्ध युद्ध को प्रस्तुत हैं तो सत्य की रक्षा और धर्म के परिपालन हेतु इच्छामृत्यु को भी खंडित करने की प्रतिसम्वेदनशील चुनौती साक्षात धर्म की है।श्रीकृष्ण का शंखनाद धर्म की आवाज है।जो यह संदेश देता है कि जब पुण्यधनी और महामनीषी लोग भी अधर्म व अन्याय के पथ का अनुसरण करें तो धर्मार्थ सत्य के रक्षार्थ क्रोधजन्य चुनौतियों का प्रत्युत्तर देना भी प्रतिसम्वेदनशील चुनौती का ही दायित्व होता है।यही कारण है कि पांडव भीष्म के शंखनाद का कोई प्रत्युत्तर नहीं दिये।वे जानते थे कि भगवान से हारना अच्छा है,भगवान से लड़ना या भगवान से लड़कर जीतना भी ठीक नहीं है।जिसके चलते युद्ध आरम्भ करने के आरोप से जहां पांडव बच गए वहीं दुर्योधन इतिहास में कलंकित अध्याय बना हुआ है।
किसी शायर ने कहा है कि-
जिंदगी जिंदादिली का नाम है,
मुर्दादिल क्या खाक किया करते हैं।।
वस्तुतः जिंदादिल और मुर्दादिल का यदि विश्लेषण किया जाय तो यही स्प्ष्ट होगा कि जो व्यक्ति जीवन में चुनौतियों से लड़ लड़कर आगे बढ़ता है,वह अपूर्व व्यक्तित्व का धनी होता है,उसकी कीर्ति युगों युगों तक स्वर्णाक्षरों में अंकित रहती है,जबकि समस्याओं से दूर भागने वाले लोग केवल भोजन,शयन,सन्तानोत्तपत्ति और मरण के ही निमित्त जीते जी पशुरूपेण भूभार बने रहते हैं।जिनका जीवन भी मृतप्राय ही होता है।अतः चुनौतियों को जिंदादिली का उत्प्रेरक कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अंततः सारसंक्षेप में इतना ही कहना समीचीन होगा कि सोना आग में तपकर निखरता है,व्यक्ति चुनौतियों से दो चार होकर प्रतिमान बनता है,आदर्श बनता है।ऐसे ही लोगों के जीवनवृत्त को महाजनों येन गतो सपंथा कहते हुए वेदों ने अनुसरण की बात कही है।यही नाम के अमरत्व का प्राणभूत तत्व भी है।।
– डॉ.उदयराज मिश्र
मंडलीय अध्यक्ष,अयोध्यामण्डल
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ,उत्तर प्रदेश
(माध्यमिक संवर्ग)




