
जीवन में हमें दिन के समय शुभ
और परोपकारी कार्य कर सकें
जिनकी वजह से हमें जीवन के
पूर्ण सुख और संतोष मिल सकें।
जिस सुख व शांति के फलस्वरूप
रात में चिन्तामुक्त हो निद्रा ले
सकें,
अगली सुबह बिल्कुल तरोताज़ा हो,
नया दिन जीने का मौक़ा ले सकें।
ऐसा कौन है भ्रमणशील संसार में,
जो जन्म – मृत्यु से परे हो गया हो,
यथार्थ में उसका जन्मना सफल है,
जिससे सामाजिक गौरव वृद्धि हो।
रूठ कर हमसे लक्ष्मी चली जायें,
तो उस देवी को मनाना सरल है,
जीवन में संस्कार रूठ जायें तो,
उनका फिर से पाना मुश्किल है।
आदित्य रूठने मनाने का काम ही
जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन है,
इसे ख़ुशी से और शौक से जीना है,
वरना इस दुनिया में और क्या रखा है।
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ




