
तन्हाई का यह रास्ता चुनता यहां कौन।
इस दर्द की दीवार को बुनता यहां कौन।।
मांगी थी सदा मैने तो महफिल ही तुम्हारी।
पर खामोशी की आह को सुनता यहां कौन।।
करदी है जुदाई ने खिज़ा जैसी यह हालत।
अब ज़ख्म के इन फूलों को चुनता यहां कौन।।
रोशन ही रहे रात भर उम्मीद के दीपक।
तकदीर की इस मात को बुनता यहां कौन।।
शिकवा नहीं कोई भी जमाने से “आकाश”
हाथों की लकीरों को बदलते यहां कौन।।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश



