
ओ माँ तू तो है अनुपमेय!
तेरा सानी नहीं कोई जग में।
फिर क्या बात करूँ तेरे आँचल की,
वह तो है ऐसी छतरी,
बचाती हर आगत-अनागत
बलाओं से।
तो फिर है क्या बिसात धूप-शीत बरखा की!
थाम छोर उसका होता मन निर्भीक,
नयनों में मारे फूँक, पीड़ा होती छू।
वक्त बेवक्त बन मृदुल वितान दे जाए कितना सकून!
तेरे आँचल में है माँ तेरा अहसास,
कभी न हो विकल बालमन जब हो उसके पास।।
रचयिता –
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक रचना,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




