
जाग माँ फिर से,
वर दे आत्मज्ञान का।
हो रहा चहुंँ ओर तांडव,
हिंसा और अज्ञान का।
प्रबुद्ध चेता सो रहे ,
दायित्व का नहीं भान है।
भौतिक जड़वाद पर,
हो रहा अभिमान है।
हुंकार भर माँ रोष भरी,
बोध हो पहचान का।
जाग माँ फिर से,
वर दे आत्म ज्ञान का
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प्रसन्नवदना माँ हुई थीं,
धवल-शोणित स्नान कर,
जब सिर हथेली पर लिए,
सुत चले स्वतंत्रता-राह पर।
स्वप्न बोझिल थीं ये आंँखे,
आभास नवल विहान का।
कैसी प्रखर दिव्याभा थी,
जागृति का वरदान था।
जाग माँ फिर से,
वर दे आत्म ज्ञान का।
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देख अदम्य वीरता,
सुदृढ़ नींवे हिल गईं।
दुष्ट शासन की सभी,
प्राचीरें गिर गई़।
फिर आज शासन हुआ निर्मम,
शक्ति घातक हो रही।
आकांक्षाएं जनता की सारी,
कफ़न ओढ़े सो रहीं।
जाग माँ फिर से,
फूंँक दे प्राणों में ज्वाला।
मरण का जयगान कर,
क्रांति का अमृत-पिला।
जाग माँ फिर से,
वर दे आत्म ज्ञान का।
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जमुन-जल फिर हुआ अपावन,
मुमुर्षु ब्रज के प्राण हैं।
टेर माँ तू सांवरे को,
मर्दन-नर्तन अभियान ले।
कर अट्टहास ,नाश हो,
अतिचार,भय और त्राण का।।
विष वमन करते कुटिल ,
दुष्ट कालिया नाग का।
जाग माँ फिर से,
वर दे आत्म ज्ञान का।
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आजादी पाई जिन्होंने,
बिना चुकाए मूल्य कोई।
हा! उन्हीं मूढ़ों ने आज,
देश की गरिमा कोई।
दृष्टि-परिधि जिनकी सीमित
मैं ही मैं का ध्यान है।
देश से यह मैं बड़ा क्यों?
कैसा यह विधान है?
इस अहं को कर तू खंडित,
समय क्रूर पद-प्रहार का।
भारत भू में भरे रव,
प्रश्न राष्ट्र सम्मान का
जाग माँ फिर से,
वर दे आत्म -ज्ञान का
जाग माँ हुंकार भर,
हो बोध निज पहचान का ।
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वीणा गुप्त
नई दिल्ली




