
वक्त की धूप में हर शख़्स बदल जाता है,
आदमी कितना भी मज़बूत हो, ढल जाता है।
कल तलक ताज लिए फिरता था जो ,
एक ही पल में वही ख़ाक में मिल जाता है।
दर्द जब हद से गुज़र जाए तो हँसी आती है,
दिल भी पत्थर-सा कई बार पिघल जाता है।
रात भर जाग के तक़दीर सँवारी जिसने,
सुबह होते ही वही भीड़ में छल जाता है।
वक्त के संग जो चलता है, सँवर जाता है,
राह की ठोकर से इंसान संभल जाता है।
जलते अरमान भी सीने में धुआँ करते हैं,
फिर कोई ख़्वाब नया दिल में मचल जाता है।
ज़िंदगी सिर्फ़ शिकायत का सफ़र तो नहीं,
सुबह का भूला शाम को फिर से घर जाता है।
‘विंध्य’ तू धैर्य की मिट्टी को बचाए रखना,
वक्त के साथ हर इक ज़ख्म भी भर जाता है।
साधना मिश्रा विंध्य
लखनऊ उत्तर प्रदेश




