साहित्य

हरित धरा का संदेश

जीतेन्द्र गिरि

पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षारोपण विषयक मौलिक दोहा-संग्रह)

 

धरती का श्रृंगार हैं, तरुवर सुंदर छाँव।

इनसे ही मुस्कान है, इनसे बसते गाँव॥

 

पौधा रोपें प्रेम से, करें न कोई देर।

कल की शीतल छाँव का, आज लगाएँ फेर॥

 

वन उपवन से जीव का, जुड़ा हुआ है प्राण।

इनके बिन सूना लगे, सारा यह जहान॥

 

शुद्ध वायु का स्रोत हैं, वृक्ष धरा के मित्र।

इनसे ही निर्मल रहे, जीवन का हर चित्र॥

 

नदियाँ, पर्वत, खेत सब, हरियाली के संग।

वृक्ष बचेंगे तो बचे, प्रकृति के सब रंग॥

 

एक वृक्ष जब रोपते, जग को देते दान।

फल, छाया, जल, प्राण का, होता है सम्मान॥

 

कटते वन की वेदना, सुन ले यदि इंसान।

हर मौसम में रोप दे, नव पौधों की जान॥

 

धरती माँ की गोद में, हरित रहे संसार।

वृक्षारोपण से करें, उसका सत्कार॥

 

पेड़ों से वर्षा मिले, पेड़ों से जलधार।

इनके बिन सूखें सभी, जीवन के आधार॥

 

१०

जो भी पौधा रोपकर, करता उसका मान।

उसके पुण्यों से सदा, महके कुल-परिवार॥

 

११

आने वाली पीढ़ियाँ, पूछेंगी यह बात।

कितने वृक्ष बचा गए, कैसी दी सौगात॥

 

१२

वृक्ष लगाना कर्म है, वृक्ष बचाना धर्म।

दोनों को अपनाइए, यही प्रकृति का मर्म॥

 

१३

पंछी, पशु और जीव सब, पाते इनमें ठौर।

तरुवर जैसे संत हों, बाँटें सुख चहुँओर॥

 

१४

धूप कड़ी जब तन जले, वृक्ष करें उपकार।

शीतल छाया दे सदा, बिना किसी व्यवहार॥

 

१५

धरती की मुस्कान हैं, वन-उपवन के पेड़।

इनसे ही खुशहाल है, जीवन का परिवेश॥

 

१६

जिस आँगन में वृक्ष हों, वहाँ बसे आनंद।

हरियाली के बीच में, खिलता जीवन-छंद॥

 

१७

लोभवश वन काटकर, मत करना अपराध।

प्रकृति रूठ जाए यदि, कौन करेगा साध॥

 

१८

पौधा केवल वृक्ष नहीं, जीवन का विस्तार।

इससे ही सुरक्षित है, कल का हर संसार॥

 

१९

हर जन का संकल्प हो, हर मौसम में एक।

पौधा रोपें प्रेम से, यही प्रकृति का टेक॥

 

२०

हरित धरा की चाह में, बढ़ें सभी के पाँव।

वृक्ष बचाकर ही मिले, सुखमय जीवन-छाँव॥

 

२१

माटी, पानी, धूप का, रखें सदा सम्मान।

वृक्षों से ही पूर्ण है, प्रकृति का वरदान॥

 

२२

पर्यावरण बचाइए, यही समय की माँग।

वृक्ष लगाकर दीजिए, धरती को नव रंग॥

 

२३

हर पौधे में दिख रहा, कल का नव निर्माण।

इसकी रक्षा कीजिए, यही सच्चा अभियान॥

 

२४

वृक्षों का उपकार है, अति गहरा, अनमोल।

इनके बिन जीवन लगे, जैसे सूना डोल॥

 

२५

जन-जन को संदेश दो, छोड़ो सारे भेद।

एक वृक्ष हर वर्ष हो, यही सफलता-खेत॥

 

 

शीर्षक “हरित धरा का संदेश” इस दोहा-संग्रह की भावना को समेटता है और पर्यावरण संरक्षण व वृक्षारोपण के प्रति प्रेरित करता है। यह रचना मौलिक शैली में शिक्षाप्रद संदेश देने के उद्देश्य से लिखी गई है।

 

~जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”

युवा लेखक, कवि एवं साहित्यकार

सक्ती (छत्तीसगढ़)

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