साहित्य

जंगल : प्राणवायु है   धरती के फेफड़े है जंगल

डॉ अनमोल कुमार

वो पीपल का पत्ता जो रात में भी ऑक्सीजन देता है।

 

 

 

वो बरगद की जड़ें जो जमीन को बांधे रखती है माँ जैसी।

 

वो साल, सागौन, नीम, बबूल –

सब सैनिक हैं जीवन के।

 

एक पेड़ काटता है आदमी

दस मिनट में कुल्हाड़ी से,

एक पेड़ बनाने में लगते हैं

बीस साल धरती को।

 

साँस उधार देती है प्रकृति,

जंगल है तो मंगल है,

सही में जंगल प्राणवायु है।

 

 

जंगल सिर्फ लकड़ी नहीं,

वो बादल का मायका है।

पत्ते से टपके ओस की बूंद

नदी बनकर प्यास बुझाती है।

 

 

 

कोरोना ने सिखा दिया

वेंटिलेटर से बड़ा है जंगल।

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