
शीर्षक- मेघ राजा आओ
दिन भर तपकर,
हर घड़ी जलकर,
सूरज भी थक गया,
चला के अलात तीर।
सूख रहे नदी-नाले,
जलते हैं वन सारे,
भूमि की दरारें कहें,
फट रहा मेरा चीर।
मनुज-विहग-पशु,
त्राहि-त्राहि कर रहे,
नभ को निहारे चक्षु,
टूट रहा उर धीर।
श्वेत-श्याम अश्व सजे,
दामिनी को साथ लिए,
मेघ राजा रथ चढ़,
झट बरसाओ नीर।।
स्वरचित
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




