साहित्य

रूप घनाक्षरी 

डॉ ऋतु अग्रवाल 

शीर्षक- मेघ राजा आओ

 

दिन भर तपकर,

हर घड़ी जलकर,

सूरज भी थक गया,

चला के अलात तीर।

सूख रहे नदी-नाले,

जलते हैं वन सारे,

भूमि की दरारें कहें,

फट रहा मेरा चीर।

मनुज-विहग-पशु,

त्राहि-त्राहि कर रहे,

नभ को निहारे चक्षु,

टूट रहा उर धीर।

श्वेत-श्याम अश्व सजे,

दामिनी को साथ लिए,

मेघ राजा रथ चढ़,

झट बरसाओ नीर।।

 

स्वरचित

डॉ ऋतु अग्रवाल

मेरठ, उत्तर प्रदेश

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