साहित्य

डॉ मंजु गुप्ता

मंगल कुंडलिया

मंगल को जन्मे कपिश , धार रूप कपि सार।।

पाप मुक्त करने धरा , लिये रुद्र अवतार।।

लिये रुद्र अवतार, चैत्र शुदि पूनम त्रेता।

मातु अंजनी गोद, बनी थी प्यार प्रणेता।।

मना केसरी मोद , खत्म असुरों का दंगल।

छायी खुशियाँ राज्य , यहाँ अब होगा मंगल।।

2

 

आया मंगल दिन बड़ा , कलयुग में है सिद्ध।

दूर अमंगल है करे , मनोकामना रिद्ध।।

मनोकामना रिद्ध, मिले फल नर सुखदायी।

पूजा है आसान , प्रभावी मंगलदायी।।

ज्येष्ठ माह का पर्व , कृपा प्रभु कपि की लाया।

भजती मैं हनुमान, लाभ शुभ मंगल आया।।

 

3

दस दिन के शिशु को कपिश , उठा खाट से भाग।

पता चला जब मातु को , लगी हृदय में आग।।

लगी हृदय में आग , कलेजा लेने दौड़ी।

डाली रोटी पास , मुझे है छत पर छोड़ी।।

बना दिसंबर खास , प्रसादी प्रभु दें उस छिन।

बेटी बचा मिसाल , जश्न मंगल का दस दिन।।

डॉ मंजु गुप्ता

वाशी , नवी मुंबई

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