
ऐसा नहीं है कि तुम आज याद आये हो
यादों में तो समाहित ही हो तुम
तुम्हें गुनती हूँ, सुनती हूँ, सोचती हूँ
और कभी-कभी लिखती हूँ
तब : जबकि
मुश्किल हो जाता है भावों को
सहेजकर अंदर रखना ।
सुबह-सुबह बिस्तर से उठते ही दायें-बायें देखा
नहीं थे तुम सिरहाने
हाथ में घड़ी लिए हुए
‘हैप्पी बर्थडे’ कहने को ।
बेहद पसंद थी घड़ियाँ तुम्हें
समझ नहीं आता, क्या करूँ इतनी घड़ियों का!
‘मोबाइल है न समय देखने को’
मेरी दलील होती ।
समय सबसे बड़ी चीज़ है,
घड़ी में समय देखने की बात ही अलग है
सीधा-सा उत्तर मिलता ।
‘मोती की चूड़ी नहीं है मेरे पास’
यूॅं ही कई एक दिन बातों-बातों में कह गई मैं
खास आश्चर्य नहीं हुआ मुझे, कि
अगले जन्मदिन पर मोतियों की चैन वाली
घड़ी गिफ़्ट की थी तुमने ।
घड़ी के लिए विशेष बॉक्स भी आया था
जिसमें बिछाया था वैल्वेट नीचे।
एलर्जी हुई थी मुझे एक घड़ी की हुक से
तुमने प्लास्टिक के बेल्ट बदल दिये।
पढ़ाई में अव्वल,
शालीनता में अव्वल,
सरलता में अव्वल और
हर कला में अव्वल ।
बीच-बीच में बदलते रहते घड़ियों की बैटरियां,
घड़ियाँ चलती रहनी चाहिए
तुम्हारा कहना होता।
तुम्हारे आध्यात्मिक सफ़र को
एक वर्ष बीत गया।
सारी घड़ियाँ बंद हो गई
सिवाय एक के।
क्यों थे तुम इतने व्यवस्थित,इतने ऑर्गेनाइज्ड!
और
क्यों हूँ मैं इतनी कैजुअल!
**मधु माहेश्वरी गुवाहाटी असम




