
न जाने किससे नेह लगाया,
जो पत्थर था उसे देव बनाया।
आंखों से अश्रु छलक पड़ा है,
सारा भरम अब टूट गया है।
मैं तो सीधा साधा सा था,
बड़ा बड़ा गम पी जाता था।
सब कुछ आज गवा बैठा हूँ,
पर सबको लगता मैं झूठा हूँ।
जो हृदयहीन प्राणी होता है,
उसे सब कुछ झूठा लगता है।
बंदर ना जाने अदरक का स्वाद,
प्रभु तो सब कुछ देखता है।
छोटा खाल का मोटा होता,
बड़ा पेड़ खजूर का होता।
पंक्षी को मिले भी न छाया,
फल भी बहुत ही दूर होता।
पेड़ वही अच्छा लगता है,
जो झूक कर फल देता है।
इंसान भी वही अच्छा होता
जो सरस मधुरता बिखेरता है।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️




