
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत विरोध नहीं, बल्कि मर्यादित विरोध है। प्रश्न पूछना लोकतंत्र है, उत्तर माँगना लोकतंत्र है, लेकिन पत्थर उठाना लोकतंत्र नहीं है। संविधान ने आवाज़ दी है, हथियार नहीं।
जो सत्य के पथ पर चले, सम्मान उसका हो,
जो देश का प्रहरी बने, अभिमान उसका हो।
अधिकार सबको हैं यहाँ, यह देश का विधान,
पर दंड भी हर अपराध का, समान उसका हो।
याद रखिए…
किसी भी आंदोलन की सफलता भीड़ की संख्या से नहीं, उसके अनुशासन से मापी जाती है। जिस दिन आंदोलन में हिंसा प्रवेश कर जाती है, उसी दिन उसके नैतिक तर्क कमजोर पड़ने लगते हैं।
मशालें हाथ में हों तो उजाला भी करो,
हृदय में देश हो तो संभाला भी करो।
अगर आंदोलनों से देश बदलना चाहते हो,
तो पहले क्रोध पर कुछ ताला भी करो।
नेतृत्व केवल मंच से नारे लगाने का नाम नहीं है। नेतृत्व का अर्थ है—अपने साथ चलने वालों को कानून की मर्यादा सिखाना। यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है, तो उसे उसके कर्मों का उत्तर स्वयं देना होगा। न्यायालय का काम साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करना है, न कि नारों के आधार पर।
न न्याय बिके, न झुके, यही देश की शान,
न्यायालय का ऊँचा रहे सदा सम्मान।
निर्दोष सुरक्षित रहें, दोषी पाए दंड,
इसी एक सूत्र में बसता हिंदुस्तान।
किसी भी घटना में यदि सुरक्षा बलों पर हमला होता है, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचती है या निर्दोष नागरिक पीड़ित होते हैं, तो दोषियों पर कार्रवाई होना कानून का दायित्व है। उसी प्रकार यदि कहीं किसी निर्दोष के साथ अन्याय हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच और न्याय भी उतना ही आवश्यक है।
न अपने पक्ष का अपराध छिपाइए कभी,
न दूसरे का दोष बढ़ाइए कभी।
जो सत्य है उसी के साथ खड़े रहिए,
विवेक को भीड़ में गँवाइए कभी।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हम अपने-अपने दलों की जय बोलें। आवश्यकता इस बात की है कि हम राष्ट्र की जय बोलें। क्योंकि सरकारें बदलती रहती हैं, आंदोलन समाप्त हो जाते हैं, लेकिन राष्ट्र और संविधान शाश्वत रहते हैं।
नारा नहीं, विचार चाहिए,
क्रोध नहीं, व्यवहार चाहिए।
देश रहेगा तभी सुरक्षित,
सबको न्याय समान चाहिए।
याद रखिए—
“न किसी निर्दोष को कटघरे में खड़ा किया जाए, न किसी दोषी को संरक्षण दिया जाए। यही न्याय है, यही लोकतंत्र है और यही राष्ट्रधर्म है।”
जय हिंद! वंदे मातरम्!
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’




