साहित्य

संयुक्त परिवार : रिश्तों की छाँव में जीवन का उत्सव

दिनेश पाल सिंह

आज जब संसार तेजी से एकल परिवारों की ओर बढ़ रहा है, तब संयुक्त परिवार की स्मृतियाँ मन में किसी मधुर गीत की तरह गूँज उठती हैं। संयुक्त परिवार केवल लोगों का समूह नहीं होता, वह भावनाओं, संस्कारों, अनुभवों और आत्मीयता का ऐसा विशाल संसार होता है जहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी रिश्ते की डोर से जुड़ा होता है।

एक बड़ा सा आँगन, चार-पाँच भाइयों की हँसी, दो-तीन बहनों की चहल-पहल, ताऊ जी का अनुशासन, ताई जी का ममत्व, चाचा जी का स्नेह और चाची जी का अपनापन—यही तो संयुक्त परिवार की पहचान है। घर में मम्मी-पापा के साथ-साथ दादा-दादी का अनुभव और आशीर्वाद बच्चों के व्यक्तित्व को गढ़ने का कार्य करता है।

 

सुबह होते ही घर में अलग ही रौनक दिखाई देती है। कोई पशुओं के चारे की व्यवस्था कर रहा है, कोई खेतों की ओर जाने की तैयारी में है, तो कोई बच्चों को विद्यालय भेजने की चिंता कर रहा है। चारों ओर कार्यों की व्यस्तता होती है, परन्तु उस व्यस्तता में भी प्रेम और अपनत्व की मिठास घुली रहती है।

 

खेती-बाड़ी से जुड़े परिवारों में संयुक्त परिवार का महत्व और भी बढ़ जाता है। खेत केवल अन्न नहीं उगाते, वे परिश्रम, सहयोग और एकता की फसल भी तैयार करते हैं। बड़े भाई हल संभालते हैं, छोटे भाई सिंचाई का कार्य देखते हैं, और घर की महिलाएँ परिवार के लिए भोजन और व्यवस्थाओं में सहयोग करती हैं। जब खेतों में सुनहरी फसल लहलहाती है, तब उसकी खुशी पूरे परिवार के चेहरे पर दिखाई देती है।

संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी विशेषता उसका संवाद होता है। भोजन के समय सब एक साथ बैठते हैं। दिनभर की बातें साझा होती हैं। बच्चे अपने अनुभव सुनाते हैं, बड़े उन्हें जीवन के मूल्य समझाते हैं। कभी-कभी हँसी-मजाक भी चलता है—

“चाचा जी, इस बार आम के पेड़ पर सबसे पहले मेरा अधिकार रहेगा।”

“अरे भई, पहले पेड़ पर चढ़ना तो सीख लो, फिर अधिकार की बात करना!”

इतना सुनते ही पूरा आँगन ठहाकों से गूँज उठता है।

त्योहारों पर तो संयुक्त परिवार का स्वरूप और भी मनोहारी हो जाता है। बुआ जी और फूफा जी का आगमन, मामा जी का अचानक आ जाना, चचेरे-तहेरे भाई-बहनों का मिलन—सब मिलकर घर को उत्सव में बदल देते हैं। रक्षाबंधन, दीपावली, होली और विवाह जैसे अवसर केवल पर्व नहीं रहते, वे रिश्तों के नवनीकरण का माध्यम बन जाते हैं।

संयुक्त परिवार में बच्चों को केवल शिक्षा नहीं मिलती, संस्कार भी मिलते हैं। वे सीखते हैं कि बड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है, छोटे भाई-बहनों का ध्यान कैसे रखा जाता है और परिवार के सुख-दुःख में सहभागी कैसे बना जाता है। यही संस्कार आगे चलकर उन्हें अच्छा नागरिक और अच्छा इंसान बनाते हैं।

निस्संदेह, समय के साथ जीवन शैली बदल रही है, परन्तु संयुक्त परिवार की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। जहाँ स्वार्थ बढ़ रहे हैं, वहाँ संयुक्त परिवार निःस्वार्थ प्रेम का संदेश देता है। जहाँ अकेलापन बढ़ रहा है, वहाँ यह अपनत्व का आश्रय प्रदान करता है।

संयुक्त परिवार वास्तव में एक ऐसा विशाल वटवृक्ष है जिसकी जड़ों में संस्कार, तने में विश्वास, शाखाओं में रिश्ते और फलों में प्रेम बसता है। इसकी छाया में पला-बढ़ा व्यक्ति जीवनभर आत्मीयता, सहयोग और मानवीय मूल्यों की सुगंध अपने साथ लेकर चलता है।

 

कवि: दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

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