साहित्य

सरसी छंद

डॉ गीता पांडेय

आजादी के बीत गए हैं,आज अठत्तर साल।
फिर भी हरदम घुटती रहती,हाल हुए बदहाल।।
आजाद कहूँ खुद को कैसे,नहीं सुरक्षित लाज।
जगह-जगह मौजूद दरिंदे,चीर खींचते आज।।
पंथ अकेले चलना दुष्कर,नजर गड़ाए गिद्ध।
खुल परिहास नहीं कर पाऊँ,पूर्ण रूप से सिद्ध।।
बचपन से ही बँधी हूँ बंधन,नारी का हूँ रूप।
मन कचोट कर रह जाता है, अतृप्तता की धूप।।
धर्म सनातन पालन करके, खुश रखती परिवार।
पर बदले में मिले नहीं वह, जिसकी मैं हकदार।।
कैसे कह दूंँ मैं स्वतंत्र हूँ,पग- पग पर अवरोध।
पुरुष वर्ग से विनय यही है, इस पर करिए शोध।।
जब भी जहांँ जरूरत पड़ती, सदैव रहती अग्र।
सभी क्षेत्र में काम करें है, फिर भी रहती व्यग्र।।
जब तक कुदृष्टि पुरुष न बदली,बदले नहीं समाज।
नारी सदा मान की भूखी,नहीं चाहती राज।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश
संपर्क सूत्र- 7054 8520 21

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