
संसार में , तुम सोहे, निरांतक।
नागेंद्र हे, पट धारे , मृगांतक।।
धारे गला , अहिमाला , विशृंखल।
विश्वेश हे, मुझ को दो ,कृपा बल।
संवेदना , रचना में , चला चल।
पीना पड़े , मुझ को है , हलाहल।।
विज्ञेय हे , वृषवामी , रचे शिव।
योगेश हे, वसुधामा , सजे दिव।।
हो काव्य में , प्रभु गौरा , सदा स्वर।
बोलो सभी , ऋषि कर्ता ,कवि: हर।।
आनंद हो , सच भी हो ,कपर्दिन।
अव्यक्त हो , प्रभु धारे , मृगाजिन।।
धर्मांग हे , दुख का हो ,निवारण।
आलोक हे, गम का हो , विदारण।।
मैंने किया , मन तेरे, समर्पण।
मेरा सदा , पथ भी हो , प्रसर्पण।।
डॉ मंजु गुप्ता,
वाशी , नवी मुंबई।




