
कश्मीर की हसीन और बर्फ़ीली वादी पर ढलता हुआ सूरज अपनी सुर्खी बिखेर रहा था और डल झील के शांत पानी में शिकारे तैर रहे थे। किनारे खड़े चिनार के दरख़्तों से सुर्ख पत्ते टूटकर जमीं पर ऐसे बिछ रहे थे जैसे कुदरत ने कोई मखमली कालीन बिछा दिया हो और गुलमर्ग की हरी-भरी ढलानों पर ठंडी हवाएं सिसकियां ले रही थीं। इसी वादी के सबसे आलीशान मकाम पर वाकये शालिमार विला का मालिक ज़ैन अपनी बालकनी में खड़ा था जो इस पूरी वादी के सबसे बड़े सेब के बाग़ात और पश्मीना के कारोबार का वारिस था। वह बेहद हसीन और संजीदा इंसान था लेकिन बचपन के एक हादसे में उसका एक पैर कमजोर हो गया था जिसकी वजह से वह थोड़ा सा लड़खड़ाकर चलता था और इसी लड़खराहट ने उसके अंदर एक अजीब सा वहम और एहसास-ए-कमतरी पैदा कर दी थी। तभी हवेली के बड़े से बाग़ में ज़फ़रान के फूलों के बीच से गुजरती हुई आयत आई जिसकी सादगी वादी की सुबह जैसी ताज़ा थी और जिसकी आँखों में डल झील जैसी गहराई थी। वह पास के ही एक अनाथालय की देखरेख करती थी और उसे ज़ैन की दौलत से नहीं बल्कि उसके अंदर छिपे एक बेहद पाक और तन्हा दिल से इश्क़ था जिससे दोनों की मंगनी हो चुकी थी और पूरी वादी दोनों की मोहब्बत की कसमें खाती थी।
सर्दियां शुरू होने वाली थीं और पहाड़ों पर हल्की बर्फबारी का सिलसिला शुरू हो चुका था जब ज़ैन का बचपन का जिगरी दोस्त अर्श फौज की छुट्टी पर वापस कश्मीर आया जो एक जाँबाज़ आर्मी ऑफिसर था और ज़ैन के लिए अपनी जान भी छिड़कता था। ज़ैन ने अपने दोस्त के आने की खुशी में एक बड़ी दावत रखी जहां चिनार के पत्तों की छाँव में जब अर्श और आयत का आमना-सामना हुआ तो मानो वादी की हवाएं एक पल के लिए ठहर गईं क्योंकि कॉलेज के दिनों में अर्श और आयत एक-दूसरे को बेपनाह चाहते थे लेकिन एक गलतफहमी और अर्श के अचानक सरहद पर चले जाने की वजह से दोनों का राब्ता टूट गया था। अब आयत उसके सबसे अजीज दोस्त की मंगेतर थी इसलिए अर्श ने तय किया कि वह अपने दोस्त की खुशियों के बीच कभी नहीं आएगा और आयत ने भी अपने आज को वफ़ादारी सौंप दी थी पर ज़ैन की बारीक और शक्की नजरों ने इस खामोशी को भांप लिया था।
दिन गुजरते गए लेकिन ज़ैन के दिमाग में शक का कोहरा गहरा होता गया और उसके जेहन में ख्याल आता कि क्या आयत उससे सिर्फ दौलत की वजह से शादी कर रही है या वह अर्श के फौलादी जिस्म को पसंद करती है क्योंकि वह खुद अपाहिज है। इस वहम में उसने एक खौफनाक इम्तिहान लेने की ठानी और एक बर्फीली रात अपनी कार को जानबूझकर एक पेड़ से टकरा दिया जिससे दुनिया के सामने यह जाहिर हो सके कि इस हादसे के बाद उसके दोनों पैर हमेशा के लिए बेकार हो चुके हैं और अब वह जिंदगी भर व्हीलचेयर से नहीं उठ पाएगा। वह व्हीलचेयर पर बैठकर गिरती हुई बर्फ को देखते हुए आयत से बोला कि तुम आजाद हो और चाहो तो अर्श का हाथ थाम सकती हो पर तभी आयत की आँखों से आँसू छलक पड़े और उसने झुककर ज़ैन के हाथों को चूमते हुए कहा कि मेरी मोहब्बत तुम्हारे जिस्म की मोहताज नहीं है और अगर तुम जिंदगी भर इस कुर्सी पर रहोगे तो आयत ता-उम्र तुम्हारी बैसाखी बनने को तैयार है। दूसरी तरफ जब अर्श को ज़ैन के इस शक का पता चला तो वह तड़प उठा और ज़ैन से कहा कि आयत मेरा गुज़रा हुआ कल थी लेकिन वह तुम्हारा आज है और मेरी मोहब्बत से हजार गुना बड़ी तुम्हारी दोस्ती है जिसके बाद अर्श ने उसी वक्त अपनी छुट्टी रद्द कराकर हमेशा के लिए वादी छोड़ने का फैसला कर लिया।
अर्श अपनी जीप लेकर जम्मू की तरफ बढ़ रहा था कि इसी बीच ज़ैन का चालाक चचा जो इस शक का फायदा उठाकर जायदाद हड़पना चाहता था उसने पहाड़ी रास्ते पर अर्श की गाड़ी के ब्रेक फेल करवा दिए जिससे जीप एक गहरी खाई में जा गिरी और उसमें धमाके के साथ आग लग गई। जब यह खबर शालिमार विला पहुँची तो ज़ैन के पैरों तले से जमीन खिसक गई और उसे एहसास हुआ कि उसने किस कदर अपने सच्चे दोस्त और अपनी पाक मोहब्बत पर शक किया था जिससे वह अपनी सारी कमजोरी और वहम भूल गया और उसके अंदर अपनेपन की वो ताकत जागी कि वह अचानक अपनी व्हीलचेयर छोड़कर उठ खड़ा हुआ। आयत ने जब ज़ैन को अचानक अपने पैरों पर खड़ा देखा तो उसके मुँह से चीख़ निकल गई और उसकी आँखों में हैरानी तथा बेपनाह गुरूर आ गया जिससे वह ज़ैन को रोकने के लिए नहीं बल्कि उसकी ढाल बनने के लिए उसके पीछे भागी। ज़ैन लड़खड़ाता हुआ पूरी ताकत से दौड़ता हुआ हादसे की जगह पहुँचा और धड़कती हुई आग तथा गिरती हुई बर्फ के बीच से अपनी जान की बाजी लगाकर अपने भाई जैसे दोस्त अर्श को बाहर खींच लिया जिससे ज़ैन का पैर बुरी तरह झुलस गया लेकिन उसके दिल का सारा मैल धुल गया।
जब ज़ैन अर्श को बचाकर बर्फ पर गिरा तो आयत ने दौड़कर ज़ैन को अपने सीने से लगा लिया और रोते हुए मुस्कुराई कि तुम्हारे पैर कभी कमजोर थे ही नहीं बल्कि कमजोर तो तुम्हारा वहम था और आज तुम्हारे इस हौसले ने मेरे इश्क़ का मान रख लिया। कुछ दिनों बाद श्रीनगर के मिलिट्री हॉस्पिटल के कमरे की खिड़की से बाहर पहाड़ों पर ताजी सफेद बर्फ की चादर बिछी थी और आसमान बिल्कुल साफ था जहां कमरे में मौजूद ज़ैन ने अर्श का हाथ पकड़कर माफी मांगी तो अर्श ने मुस्कुराते हुए ज़ैन के कंधे पर हाथ रखा कि फर्ज की जंग में भले ही मैं जीत जाता हूँ लेकिन दिल की बाजी हमेशा तुम ही जीतते हो और तुमने आग में कूदकर मेरी जान बचाई है जिससे आज से मेरी यह जिंदगी तुम्हारी अमानत है। अर्श ने अपनी फौजी कैप पहनी और दोनों को दुआएं देकर मुस्कुराते हुए सरहद की तरफ रुखसत हो गया जिसके बाद वादी में एक नई सुबह की धूप खिल रही थी और ज़ैन के चलने में आज भी थोड़ी सी लड़खराहट थी लेकिन उसके दिल में अब कोई शक नहीं था जिससे आयत ने उसका हाथ थामा और दोनों चिनार के साए तले मोहब्बत और मुकम्मल यकीन के साथ अपने नए सफर पर चल पड़े।



