
#में खुशबू का झोंका हूं
एक कविता
#मैं खुशबू का झोंका हूं तुम दरिया का पानी हो
तेरी-मेरी किस्मत की बस इतनी कहानी हो।
मिलकर भी मिल न सके हम कैसी ये रवानी है,
पास खड़े हैं फिर भी देखो दूरी की निगहबानी है।
मैं बादल की भटकी छाया, तुम धरती की प्यास प्रिये,
मैं मन का अनकहा सपना तुम आँखों की आस प्रिये।
हर धड़कन में नाम तुम्हारा हर साँस में तेरी वाणी है
फिर भी अपने बीच खड़ी समय की एक कहानी है।
मैं खुशबू बन उड़ जाता हूँ तुम लहरों में बह जाती हो,
दो राहों के राही बनकर हर मोड़ पे रह जाती हो।
न कोई शिकवा है तुमसे न कोई परेशानी है
जो मिल न सके फिर भी अमर हो वही सच्ची निशानी है।
तेरी यादों के दीपक से, मेरा जीवन रोशन है,
विरह की इस मधुर अगन में, प्रेम सदा ही पावन है।
मिलन नहीं तो क्या ग़म है, प्रेम कहाँ मिट पाता है,
अधूरी सी हर प्रेम-कथा ही, जग में अमर कहलाता है!
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश
मौलिक अप्रकाशित रचना




