साहित्य

उलझनों के उस पार

प्रतिमा पाठक

*उलझनों के उस पार*

 

एक तरफ़ धागे हैं,

जो उलझकर भी एक-

दूसरे का साथ नहीं छोड़ते,

बस चुपचाप प्रतीक्षा करते हैं

किसी धैर्यवान हाथ की।

और एक तरफ़ रिश्ते हैं,

जो मन की हल्की-सी

शिकन से ही अपने भीतर

दरारें महसूस करने लगते हैं।

 

धागों को पता है,उलझना

उनका अंत नहीं, एक और

जुड़ाव की शुरुआत है।

पर रिश्ते वे अक्सर शब्दों

से नहीं अनुमानों से

घायल हो जाते हैं।

 

एक अनकहा सवाल,

एक अनसुना उत्तर,

एक अनदेखी पीड़ा

और बरसों की आत्मीयता

खामोशी के जंगल में

भटकने लगती है।

 

मैंने देखा है,

टूटा हुआ धागा फिर भी

गाँठ बाँधकर काम आ जाता है,

पर टूटा हुआ विश्वास

हर बार अपनी पुरानी

आकृति नहीं ले पाता।

 

इसलिए जब भी कोई रिश्ता

उलझे, उसे झटके से मत

खींचना, थोड़ा समय देना,

थोड़ा स्नेह,थोड़ी विनम्रता।

क्योंकि कुछ गाँठें

उँगलियों से नहीं,

हृदय से खुलती हैं।

 

और शायद यही जीवन की

सबसे बड़ी बुनाई है,

जहाँ प्रेम, हर उलझन के

बाद भी साथ रहने का कोई

नया रास्ता खोज लेता है।

प्रतिमा पाठक

दिल्ली

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