साहित्य

बिधाता छंद सृजन शीर्षक- गर्मी

डॉ जगदीश

बढ़ा है ताप सूरज की, बढ़ी बेचैनियाँ सारी।

हुई अंगार धरती है, दहकता दिन हुआ भारी।।

तपन बढ़ती रही कैसे, यहाँ देखो जरा प्यारे।

धधकती भूमि भी ऐसे, जले अंगार है सारे।।

 

हवा चलती नहीं अब तो, पसीना चू रहा कैसे।

सभी अब फेल हैं ऐसी, बढ़ी है गर्मियाँ जैसे।।

अगर बिजली कटौती हो, तड़पते लोग हैं सारे।

उतर जाते सभी कपड़े, बदन दुख दर्द के मारे।।

 

नहीं सुख चैन मिलता है, कभी उठता कभी सोता।

नहीं हो नींद पूरी तो, जमी पर बैठ कर रोता।।

करूँ मैं प्रार्थना भगवन, हमारी बात सुन लेना।

अभी तो भेज दो बारिश, जरा जल्दी इसे देना।।

 

डॉ जगदीश नारायण गुप्त

“जगदीश”

बनारस✍️✍️

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