
जीवन के प्रियतम मेरे
सांसों के सरगम मेरे
जो भी हो तुम मेरे कृष्णा
मेरे हो बस मेरे।
ढूंढ ढूंढ के हार चुके थे
द्वर गली हम चौबारे
आज मिले तुम मन-मंदिर में
नटवर नागर मेरे।
अब न जाना तुम मंदिर से
रहना मुरली संग में
देख सके जो तुमको नैना
मेरे सांझ सवेरे।
कहा न हमने कभी किसी से
आज कहा है तुमसे
क्योंकि तुमने ही तो डाले
जीवन के संग फेरे।
डॉ.उमा रानी दुबे
जयपुर,राजस्थान



