
की धरती गाती है, वह गौरवमयी कहानी,
जिसने रण में प्राण लुटाए, थी लक्ष्मीबाई रानी।
नयनों में अंगार सजाए, मन में दृढ़ विश्वास,
मातृभूमि की रक्षा हेतु, अर्पित किया सुवास।
जब संकट की घड़ी घिरी थी, चारों ओर अँधियारा,
तब बनकर वह दीप जली थी, साहस का उजियारा।
कोमल तन में शक्ति ऐसी, पर्वत भी झुक जाए,
उसकी दृढ़ता के सम्मुख तो, काल स्वयं थर्राए।
पीठ बाँध शिशु को अपने, कूदी रण के बीच,
ममता और पराक्रम का वह, अद्भुत था संदेश।
तलवारों की चमक देखकर, शत्रु हुआ हैरान,
नारी केवल स्नेह नहीं है, वह भी है तूफान।
घोड़े पर जब चढ़ती रानी, गूँज उठे मैदान,
भारत माँ के जयघोषों से, काँपे थे अभिमान।
स्वाभिमान की रक्षा खातिर, सब कुछ किया न्यौछावर,
वीरों की उस पावन गाथा को, न भूलेगा यह भूधर।
बलिदानों की पराकाष्ठा का, वह अनुपम अध्याय,
जिसे पढ़े हर पीढ़ी सीखे, साहस का पर्याय।
नारी शक्ति की वह प्रतिमा, प्रेरणा का प्रकाश,
जिसके जीवन से मिलता है, संघर्षों का विश्वास।
आज भी उसकी अमर कहानी, देती यही पुकार,
अन्यायों से मत घबराना, रखना ऊँचा विचार।
शत-शत नमन वीरांगना को, भारत का अभिमान,
लक्ष्मीबाई अमर रहेंगी, जब तक रहे जहान।
~जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”छत्तीसगढ़




