राख बिखरी पड़ी है हवाओं में
जो मणिकर्णिका से उड़ती है।
घाटों में एक परत बिछ जाती है
सुबह जब गँगा घाट से उतरती है।
भस्म बन भाल पर सजती भक्तों के
महादेव की गूँज हवाओं में तैरती है।
अस्सी हो, दशाअश्वमेध हो या नमो
हर नाव में पदचिन्ह बन रूकती है।
ऐ बनारस! रोक ले थाम कर हाथ
ये राख उड़ उड़ कर कहती है।
मणिकर्णिका सूनी होती है न काशी
ये भस्म महादेव की मुनादी है।
©संजय मृदुल
रायपुर




