
इल की चमक में खोकर,
मन का आँगन सूना है।
चेहरों की इस भीड़ के भीतर,
हर इंसान अकेला-सा है॥
शब्दों की मुस्कानें सजती,
भाव मगर अनजान रहते।
दिल के सच्चे दर्द यहाँ पर,
अक्सर ही बेनाम से रहते॥
मित्र हजारों बन जाते हैं,
एक क्लिक के रिश्तों से।
पर मुश्किल की राहों में,
कोई साथ नहीं देगा यहाँ से॥
स्टेटस, फोटो और प्रतिक्रियाएँ,
अब जीवन का मापदंड बनी।
सच्चे संवादों की खुशबू न जाने,
धीरे-धीरे कहीं खो सी गई॥
घर के आँगन में बैठे लोग,
अब दूर-दूर से लगते हैं।
अपनों के होते हुए भी न जाने,
क्यों सब तन्हा से दिखते हैं?
तकनीक स्वयं दोषी नहीं है,
दोष है हमारे चुनावों का।
जब संबंधों से मुँह मोड़ें सब,
तब क्या अर्थ रहे फिर भावों का?
आओ फिर से हाथ बढ़ाएँ,
मन से मन का सेतु बने।
आभासी दुनिया में भी रहे,
और सच्चे रिश्ते भी जीवित रहे॥
स्क्रीन से बाहर निकलकर,
अपनों को फिर गले लगाएँ।
क्षणिक चमक के पीछे भागने से,
बेहतर है प्रेम के दीप जलाएँ॥
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




