साहित्य

पितृ

संगीता वर्मा,

प्यार का सागर ले आते,फिर चाहे कुछ न कह पाते बिन बोले ही समझ जाते।

 

दुःख के हर कोने में खड़ा उनको पहले से पाया,छोटी सी उंगली पकड़कर चलना उन्होंने सिखाया।

 

जीवन के हर पहलु को अपने अनुभव से उन्होंने बताया हर उलझन को उन्होंने अपना दुःख समझ सुलझाया।

 

दूर रहकर भी हमेशा प्यार उन्होंने हम पर बरसाया एक छोटी सी आहट से मेरा साया पहचाना बढ़ाया।

 

मेरी हर सिसकियों में अपनी आँखों को भिगोया आशिर्वाद उनका हमेशा हमने पाया,हर ख़ुशी को मेरी पहले उन्होंने जाना।

 

असमंजस के पलों में अपना विश्वास बनाया उनके इस विश्वास को हमने अपना आत्म विश्वास बनाया ऐसे पिता के प्यार से बड़ा कोई प्यार हमने नहीं पाया।

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स्वरचित मौलिक अप्रकाशित

संगीता वर्मा, कानपुर उत्तर प्रदेश

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